विकासवादी कविता : सब समान हों..
चाहे हों दिव्यांग जन
चाहे हों अछूत
कोई न रहे वंचित
सबको मिले शिक्षा
कोई न माँगे भिक्षा
चाहे हों अछूत
कोई न रहे वंचित
सबको मिले शिक्षा
कोई न माँगे भिक्षा
दुनिया की भूख मिटानेवाला
किसान कभी न करे आत्महत्या
किसी पर कर्ज का न बोझ हो
सबके चेहरे पर नई उमंग और ओज हो
किसान कभी न करे आत्महत्या
किसी पर कर्ज का न बोझ हो
सबके चेहरे पर नई उमंग और ओज हो
न कोई ऊँचा
न कोई नीचा
सब जीव समान हों
हम सब भी समान हों
न कोई नीचा
सब जीव समान हों
हम सब भी समान हों
न कोई बनिया नाजायज ब्याज ले
न कोई कन्यादान के संग दहेज ले
कोई बहु - बेटी पर्दे में न रहे
सबको दुनिया की असलीयत दिखती रहे
न कोई कन्यादान के संग दहेज ले
कोई बहु - बेटी पर्दे में न रहे
सबको दुनिया की असलीयत दिखती रहे
कोई न स्त्री को हीन माने
वह साहस की ज्वाला है
अब तक वह चुप रही
तो हुआ ये
वह साहस की ज्वाला है
अब तक वह चुप रही
तो हुआ ये
सिर्फ मानवता की हीनता
और हैवानियत का चरमोत्कर्ष
अब सब कुरीतियों - असमानताओं को मिटाना है
मानवता और विश्व शांति लाना है...
और हैवानियत का चरमोत्कर्ष
अब सब कुरीतियों - असमानताओं को मिटाना है
मानवता और विश्व शांति लाना है...
✒ कुशराज
बरूआसागर झाँसी बुन्देलखण्ड
_14/1/19_11:56अपरान्ह
बरूआसागर झाँसी बुन्देलखण्ड
_14/1/19_11:56अपरान्ह
(छात्र - बी०ए० हिन्दी ऑनर्स, तृतीय वर्ष, हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय)
संस्थापक - जै जै बुन्देलखण्ड...
Kushraaz.blogspot.com
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